A Struggling Monk (एक संघर्षरत संन्यासी)
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"A Struggling Monk" (एक संघर्षरत संन्यासी) पुस्तक पर एक संक्षिप्त नोट दिया गया है:परिचय: यह पुस्तक किसी सिद्ध संत या चमत्कारी बाबा की जीवनी नहीं है, बल्कि एक आधुनिक, शिक्षित व्यक्ति की कहानी है जो कॉर्पोरेट दुनिया छोड़कर पुरी, ओडिशा के दक्षिणामूर्ति मठ में संन्यासी बनता है। यह किताब संन्यासी जीवन के रोमांटिक ख्यालों को तोड़कर उसकी कठोर वास्तविकता को सामने लाती है।
मुख्य बिंदु:• आंतरिक संघर्ष: नायक (स्वामी आत्मानंद) को लगता था कि आश्रम में सिर्फ ध्यान और शांति होगी, लेकिन उसे अपने मन, अहंकार और पुरानी यादों (जैसे माँ के हाथ का खाना और दोस्तों की याद) से जूझना पड़ता है। उसे कभी-कभी चाय जैसी छोटी चीजों के लिए भी तरसना पड़ता है।
• बाहरी चुनौतियां: एक संन्यासी को केवल ध्यान नहीं करना होता, बल्कि उसे मठ का प्रशासन भी संभालना पड़ता है। नायक को कभी कंप्यूटर पर हिसाब-किताब करना पड़ता है, तो कभी बेईमान ठेकेदारों से सीमेंट की गुणवत्ता को लेकर लड़ना पड़ता है। उसे मच्छरों और बीमारी का भी सामना करना पड़ता है।
• ईर्ष्या और संदेह: लेखक ने बड़ी ईमानदारी से स्वीकार किया है कि गेरुआ वस्त्र पहनने के बाद भी ईर्ष्या (जैसे यूट्यूब पर प्रसिद्ध साधुओं को देखकर) और संदेह पूरी तरह खत्म नहीं होते।
• गुरु का महत्व: जब नायक हताश होकर टूटने लगता है, तो उसके गुरु उसे समझाते हैं कि "संघर्ष असफलता नहीं है, बल्कि यह कच्ची मिट्टी को पक्के घड़े में बदलने की प्रक्रिया है"।
निष्कर्ष: यह पुस्तक उन लोगों के लिए एक चेतावनी और मार्गदर्शन है जो जीवन से भागकर आश्रम में शरण लेना चाहते हैं। यह बताती है कि संन्यास का मार्ग फूलों की सेज नहीं, बल्कि एक भट्टी है जो अहंकार को जलाकर खाक कर देती है।
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