"पहचान खुद अपनी: अंधानुकरण पर एक प्रेरक कविता | उज्ज्वल कुमार सिंह"
Impossible d'ajouter des articles
Échec de l’élimination de la liste d'envies.
Impossible de suivre le podcast
Impossible de ne plus suivre le podcast
-
Lu par :
-
De :
मनुष्य को प्रकृति ने सोचने, समझने और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता प्रदान की है। फिर भी जीवन में अनेक लोग अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग करने के बजाय दूसरों की राय, भीड़ की दिशा और समाज की स्थापित धारणाओं के पीछे चलना अधिक सहज समझते हैं। परिणामस्वरूप वे अपनी मौलिक पहचान, संभावनाओं और सपनों से दूर होते चले जाते हैं।
"पहचान खुद अपनी" कविता इसी प्रवृत्ति पर एक सशक्त टिप्पणी है। यह रचना उन लोगों को आईना दिखाती है जो बिना सोचे-समझे दूसरों के कहे अनुसार जीवन जीते हैं और अपने भीतर छिपी प्रतिभा तथा निर्णय क्षमता को अनदेखा कर देते हैं। कविता के विभिन्न बिंब—हवा के साथ बहते पत्ते, किनारे बैठकर कौड़ियाँ गिनने वाले लोग, परछाइयों का पीछा करने वाले पथिक और अपने हाथ का हीरा मिट्टी समझकर फेंक देने वाले व्यक्ति—इस बात को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करते हैं कि अंधानुकरण व्यक्ति को उसकी वास्तविक मंज़िल से भटका देता है।
कवि उज्ज्वल कुमार सिंह इस कविता के माध्यम से आत्मविश्वास, स्वतंत्र चिंतन और स्वनिर्णय की महत्ता को रेखांकित करते हैं। यह रचना पाठकों को प्रेरित करती है कि वे भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय अपनी राह स्वयं चुनें, अपने विवेक पर विश्वास करें और जीवन में अपनी अलग पहचान स्थापित करें। यही संदेश इस कविता को केवल एक साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का सार भी बनाता है।